नमस्ते फ्रेंड्स, बैंक का ब्याज गाँव के ब्याज से बिल्कुल अलग काम करता है। बैंक हमेशा सालाना दर बताता है और एफडी में हर तीन महीने में ब्याज पर ब्याज जोड़ता है। मैंने यह टूल बैंक के इसी तरीके को ध्यान में रखकर बनाया है ताकि आपका हिसाब कभी गलत न हो।
फ्रेंड्स, बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि बैंक का ब्याज निकालने में और आम ब्याज निकालने में क्या फर्क है। इसका सबसे बड़ा फर्क यह है कि बैंक आपको जो दर बताता है वह हमेशा पूरे साल की होती है, महीने की नहीं।
जब आप बैंक में एफडी करवाते हैं, तो बैंक आपके पैसे पर चक्रवृद्धि ब्याज यानी कंपाउंड इंटरेस्ट लगाता है। लेकिन मज़े की बात यह है कि बैंक हर 3 महीने में आपके ब्याज को आपके मूलधन में जोड़ देता है। इसे अंग्रेजी में तिमाही कंपाउंडिंग कहते हैं।
सेविंग अकाउंट में आपके खाते में रखे गए रोज़ाना के बैलेंस के हिसाब से ब्याज तय होता है और बैंक इसे हर 3 महीने या 6 महीने में आपके खाते में डाल देता है। इसकी दर आमतौर पर एफडी से कम होती है, जैसे 3 या 4 प्रतिशत सालाना।
एक्सपर्ट टिप:
अगर आपके खाते में कोई बड़ी रकम पड़ी है जिसकी आपको अभी ज़रूरत नहीं है, तो उसे सेविंग अकाउंट में छोड़ने की बजाय उसकी एफडी करवा दें। इससे आपको बिना किसी रिस्क के लगभग दोगुना ब्याज मिलेगा।
अगर बैंक की एफडी दर 7 प्रतिशत सालाना है, तो 1 लाख रुपये पर आपको 1 महीने में लगभग 583 रुपये का ब्याज मिलता है। बैंक का ब्याज हमेशा सालाना दर से महीने में बांटा जाता है।
जी हाँ, बिल्कुल अलग होता है। गाँव का 2 रुपये सैकड़ा मतलब महीने का 2 परसेंट यानी साल का 24 परसेंट होता है। जबकि बैंक का ब्याज पूरे साल का 7 या 8 परसेंट होता है।
भारत में अब ज़्यादातर बैंक आपके सेविंग अकाउंट का ब्याज हर 3 महीने में यानी तिमाही आपके खाते में जमा कर देते हैं। कुछ बैंक इसे 6 महीने में भी जमा करते हैं।
हाँ, अगर आपको यह देखना है कि पूरे साल में आपको कितना साधारण ब्याज देना पड़ेगा, तो आप खाते के प्रकार में सेविंग अकाउंट चुनकर लोन का मोटा-मोटा हिसाब लगा सकते हैं। हालांकि लोन की ईएमआई का गणित थोड़ा अलग होता है।
बैंक एफडी पर चक्रवृद्धि ब्याज लगाता है और हर तिमाही यानी 3 महीने में आपके कमाए हुए ब्याज को आपके मेन बैलेंस में जोड़ देता है। इसे तिमाही कंपाउंडिंग कहते हैं।